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बिहार पुलिस : सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल ना करें बिहार पुलिस ने किया अलर्ट , पर सकते है खतरे में

#सोशलमीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म यथा फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप, यु-ट्यूब, टेलीग्राम इत्यादि पर अफवाह/भ्रामक/गलत खबर प्रसारित करने से संबंधित आर्थिक अपराध इकाई, बिहार पुलिस का E-Poster : 
 सोशल मीडिया के दुरुपयोग का मुद्दा ऐसा है जिसकी अब अनदेखी नहीं की जा सकती है। गलत विचारों को साझा करने से देश की आंतरिक सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। ऐसे में इसके खिलाफ कड़े कानून की सख्त ज़रूरत है। देश जैसे-जैसे आधुनिकीकरण के रास्ते पर बढ़ रहा है चुनौतियाँ भी बढ़ती ही जा रही हैं।

इंटरनेट क्रांति के दौर में सोशल मीडिया का इस्तेमाल लोगों के स्टेटस सिम्बल के साथ-साथ दैनिक आवश्यकता का आकार ले चुका है। मीडिया एक ऐसा क्षेत्र है जहां तथ्यों के आधार पर सही-गलत का फर्क बताने का कार्य करता रहा है और समाज उसी के अनुसार विभिन्न मुद्दों पर निर्णय करता है। कुछ


समय पहले तक यह पेशा बेहद सम्माननीय भी रहा है, किन्तु हाल के दिनों में इसमें जबरदस्त गिरावट दर्ज की गयी है। आपको नहीं लगता कि आज मीड़िया को कुछ लोगों द्वारा नचाया जा रहा है। सिर्फ समस्याओं से जूझना हो तो चल जाये लेकिन अब यह मुश्किल यहां तक पहुंच गई है कि टीआरपी के खेल में उलझकर प्रेस, मीडिया जैसे शब्द गायब होने के कगार पर आ पहुंचे हैं और उसकी जगह ले ली है कॉर्पोरेट प्रतिद्वंदिता ने! 
अब सवाल यह है कि लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रुप में जानी वाली मीडिया आज के दौर में क्या वाकई चौथे स्तम्भ के रुप में जानी जा रही है। इस पर अब विचार की आवश्यकता है। 
इस बात को हम मना नही कर सकते हैं  कि इंटरनेट क्रांति के इस दौर में सोशल मीडिया ने हमे ऐसे  माध्यम दिये हैं  कि हम अपनी बात को पूरे देश के सामने आसानी से रख सकते हैं। सोशल मीडिया के इन प्लेटफॉर्म्स ने विभिन्न अवसरों पर अपने महत्त्व को साबित भी किया है, चाहे देशी चुनाव हो अथवा विदेशी धरती पर कोई आंदोलन हो या फिर पर्सनल ब्रांडिंग ही क्यों न हो आज लाइक्स, फालोवर्स, शेयर जैसे शब्द हर एक जुबान पर छाये हुए हैं। 
अरविन्द केजरीवाल द्वारा गठित पार्टी ने दिल्ली राज्य के बहुचर्चित चुनाव में 80 फीसदी कैम्पेन सोशल मीडिया के माध्यम से ही किया और इसका परिणाम दुनिया ने देखा। व्यक्तिगत ब्रांडिंग के लिए भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल नेताओं, खिलाडियों, अभिनेताओं द्वारा धड़ल्ले से किया जा रहा है आप चाहे गाँव में ही क्यों न हों आपको तमाम नवयुवक अपने फेसबुक और जुड़े मित्रों से सम्बंधित गतिविधियाँ शेयर करते नजर आएंगे, पर इन सकारात्मक दृश्यों के पीछे एक कड़वी परत भी दिखती है। जिसमें सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल भी उतनी ही तेजी से बढ़ रहा है। मुजफ्फरनगर में पिछले दिनों हुए दंगों में सोशल मीडिया के इस्तेमाल की खबरें बड़ी तेजी से फैली थीं तो जम्मू कश्मीर में भी आये दिन इस तरह की खबरें देखने को मिलती ही रहती हैं इसके अतिरिक्त देश के विभिन्न भागों में नफरत भरे संदेशों को सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाया जा रहा है। कई बार इरादतन और संगठित रूप में तो कई बार बहकावे में युवक युवतियां ऐसे कदम उठा देते हैं जो उनकी गिरफ्तारी तक जा पहुँचता है। हालाँकि इस सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय जिसमें तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी गयी है। उससे इन माध्यमों का गलत इस्तेमाल करने वालों द्वारा फायदा उठाने की सम्भावना भी बढ़ सकती है। 
शायद हमें सोशल मीडिया का असली उद्देश्य समझने की जरुरत है और उसके सही प्रयोग की दिशा में हम एक कदम बढ़ायेँ तो सफल होंगें। आखिर सोशल मीडिया को विवादित बनाने में आम आदमी ही नहीं बल्कि नेताओं, खिलाडियों, अभिनेताओं द्वारा इसका प्रयोग किया जा रहा है। 
ऐसा नहीं है कि किसी के पास कोई खबर नहीं है, सही-गलत परखने वाले लोग नहीं है, खबरों की तह तक पहुँचने के रिसोर्सेस नहीं हैं, स्टोरी लिखने वाले कलमकार नहीं हैं .... बल्कि यह सब तो पहले से काफी ज्यादा मात्रा में उपलब्ध हैं पर आज, लेकिन यह सारी रिसोर्सेस बजाय की पत्रकारिता करने के, सिर्फ और सिर्फ व्यावसायिक हित साधने के काम में लाई जा रही हैं। निश्चित रूप से 


थोड़ा बहुत पत्रकारिता भी इस बीच आटोमेटिक तरीके से हो जाती है, लेकिन पत्रकारिता करते कितने लोग हैं कई संपादकों, पत्रकारों ने अपनी दलीलों की आवाज ऊंची की और दूसरों पर जमकर हमला बोला. ये तीखापन और तंज इसलिए भी खतरनाक माना जाना चाहिए क्योंकि एक बड़े चौनल एनडीटीवी ने अपनी टेलीविजन की स्क्रीन काली की, मगर यह स्क्रीन काली किसी सरकार या प्रशासन के विरोध में नहीं की गयी, बल्कि यह मीडिया के खिलाफ ही स्क्रीन काली हुई थी। 
आपको गायक अभिजीत भट्टाचार्य का वह विवादित ट्वीट तो याद ही होगा जिसमें उन्होंने गरीब आदमी को कुत्ता कहते हुए ट्विटर पर लिखा कि कुत्ता सड़क पर सोयेगा तो मरेगा ही सड़क गरीब के बाप की नहीं है वह बिचारे सलमान खान की चापलूसी या समर्थन कर रहे थे। लेकिन ट्विटर को खामख्वाह बदनाम कर गए। इसके अतिरिक्त देश से फरार पूर्व क्रिकेट प्रशासक ललित मोदी के ट्वीट्स ने देश की राजनीति में उथल-पुथल मचा रखी है, कहने का तात्पर्य यह है कि हम आज भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल विवाद फैलाने


 में या अपनी कुंठित सोच को जाहिर करने में करते हैं। मगर हमें उन लोगों से प्रेरणा लेने में जाने क्यों संकोच हो जाता है। जो बेहतरीन नेटवर्किंग और ब्रांडिंग में इन प्लेटफॉर्म्स का बेहतरीन उपयोग करते नजर आते हैं। हजारों ऐसे अखबार और मीडिया संस्थान हैं जो पैसा नहीं कमाते लेकिन उनके मालिक उन्हें बेचते नहीं क्योंकि ये रसूख जमाने और वसूली के हथियार बन चुके हैं।


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